सच की खोज हर ज़माने में हुई है. अब भी जारी है. हर युग का अपना
सच होता है. हर इंसान का अपना सच होता है, अपनी परिस्थितियाँ होती हैं. सच्चे सच का सामना
करना आज भी उतना ही मुश्किल है. कभी-कभी जब इंसान की प्रगति देखती हूँ, उसकी प्रगति का इतिहास, उसकी प्रगति की गति देखती हूँ
तो बेहद आश्चर्य होता है लेकिन उससे ज़्यादा आश्चर्य तब होता है, जब देखती हूँ कि बतौर इंसान उसने कितनी प्रगति की है... उसका ग्राफ़ नीचे जाता
दिखाई देता है. लोग कहते हैं, सबका अपना अपना ‘वर्शन’ होता है; सच का भी और झूठ
का भी. अब यही समझ में नहीं आता है, सच एक होता है, उसके वर्शन कैसे हो सकते हैं. सच से जुड़े स्वार्थ अपने अपने हो सकते हैं, लेकिन सच के वर्शन नहीं हो सकते.
आज़ादी के बाद जाने कितने सत्यप्रिय शहीद हो चुके हैं. सच की
साधना कठिन है, सच को साधना कठिन है. सच की राह के साथी नहीं मिलते, सच कोई कहना नहीं चाहता, सच कोई सुनना नहीं चाहता. हाँ, देश के लिए लड़ना और उसके लिए शहीद होने की तर्ज़ पर ही सच के लिए भी लड़ना चाहिए, लेकिन ये काम पड़ोसी के घर हो तो ही अच्छा लगता है.
ख़ैर... मैं उतनी भी निराश नहीं हूँ; ज़िंदगी
और सिनेमा, दोनों में सच का इंतज़ार करती हूँ. हम सच कब बनाएंगे, कब देखेंगे, कब लिखेंगे. कब तक झूठे या आधे-अधूरे सच
का सिनेमा हमारे लिए बनाया जाएगा, और ऊपर से कहा भी यही जाएगा
कि दर्शक (हम) यही देखना चाहते हैं. कब हम तैयार होंगे, सच को
फ़िल्मों में देखने के लिए, दिखाने के लिए और झूठ को सिरे से नकारने
के लिए!
सच तो यही है कि सच दुर्लभ है, सत्यप्रिय
ढूंढ़े से नहीं मिलते; लेकिन फिर ‘सत्यकाम’ भी तो होते हैं. हमारी चिर प्रतीक्षित आशा है ‘सत्यकाम’. ऋषि दा ने बड़ी ख़ूबसूरती से, सच के आँचल को कांटों की झाड़ियों से, नुकीले पत्थरों
से और तीखे नाख़ूनों के वार से बचाकर सामने लाया है. लेकिन शर्मनाक
बात है कि सच के सामने जो चुनौतियाँ 1969 में थीं, वही आज भी
हैं! वैसे ही फ़िल्मों के सामने भी चुनौतियाँ वही की वही हैं.
यही तो सवाल है कि इंसान के बतौर हमारी प्रगति का ग्राफ़ नीचे जाता क्यों दिखता है.
आज भी जात-पात का वही मसला है, भष्टाचार की समस्या वैसी है, समाज आज भी खुला नहीं है, भाषा आज राजनीतिक हथियार है, आतंकवाद से तो कई देशों की रोज़ी-रोटी चल रही है. और विडंबना यह है कि हमारी
साक्षरता का प्रतिशत बढ़ गया है.
